क्या ये जिंदगी महत्त्व नहीं रखती???
जिस सीवर का ढक्कन खुलने के बाद लोग उसके पास नहीं खडे हो पाते उसमें अन्दर उतरते यें मजदूर भी इन्सान हैं? यह फोटो तिलक नगर/मॉडल टाउन रोहतक की है। सीवर में इस तरीके से उतर कर सफाई करने पर 2013 में संसद में कानून बनाकर प्रतिबंध लगाया जा चुका है। लेकिन यह अमानवीय परिस्थिति में काम आज भी जारी है। इन्ही परिस्थितियों में 2019 में रोहतक में 5 सीवर कर्मचारियों की मौत भी हो चुकी है। लेकिन शासन और प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया और न ही कोई पुख्ता इंतजाम किये। इनको ऐसे ही बिना सुरक्षा इंतजाम और बिना उपयुक्त उपकरणों के काम करना होता है। *इतनी मेहनत के बावजूद इनको सिर्फ 9100 रुपए ही हर महीने मिल पाते हैं।* जबकि कागजों में तो 15100 का दावा किया जा रहा है। क्या 15100 सो रुपए भी पर्याप्त हैं? लेकिन ये कर्मचारी चाहते हैं कि हमें 15100 से भी मिल जाएं तो भी हम खुश हैं। इतनी मेहनत करने के बावजूद इतनी कम पगार पाने के बावजूद नीची जाति का ताना अलग रह जाता है। क्या सारे समाज की गंदगी को साफ करने वाले नीचे हो गये? और गन्दगी करने वाले ऊंचे? क्यों हम इस बारे में चर्चा कम ही करते हैं? क्...