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Showing posts from May, 2020

ऑनलाइन शिक्षा माध्यम की जमीनी हकीकत

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"वर्तमान समय में छात्र-छात्राओं , बुद्धिजीवियों में आनलाईन शिक्षा , आनलाईन परिक्षा के संबंध मे एक बहस छिडी हुई है।मध्यम वर्गीय छात्र-छात्राओं का एक छोटा तबका जो आर्थिक तौर पर मजबूत और तकनीकी कौशल का ज्ञान रखता है सिर्फ वही आनलाईन परिक्षा के लिए सहमत है । लेकिन छात्र-छात्राओं का बहुत बड़ा तबका जो सामान्य मजदूर -किसान परिवारों से आता है और सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी   रूप से पिछड़ेपन को झेल रहा है ,आनॅलाइन परिक्षा माध्यम के पक्ष में नहीं हैl शिक्षा ,शिक्षण पद्धति का सवाल समाज के बौद्धिक  विकास के साथ सीधे रूप से जुड़ा हुआ है ।ज्ञान का आधार उत्पादन व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से हर व्यवस्था में ऐसा विशेष वर्ग रहा है जिसका संसाधनों पर कब्जा रहा है। राज्य तंत्र के विकास का अर्थ उस विशेषाअधिकारी  वर्ग का ही विकास है जिसमें व्यापक जनता से किसी तरह का सरोकार नहीं रखा जाता। तमाम तरह के नियम, कानून ,सुविधाएं विशेष वर्ग को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं ताकि तथाकथित 'चौतरफा विकास' की अवधारणा स्थापित की जा सके। आधुनिकता के नाम पर ...

बेहतर समाज: अब नहीं तो कब?

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    बेहतर समाज: अब नहीं तो कब?             "इस अवसर पर परिवर्तन के प्रति आशावान होने के कुछ विशेष कारण भी हैं. वर्तमान व्यवस्था कि कई कमज़ोरियाँ जो दबी ढकी थी, वो उघड कर सामने आ गई हैं, सब से बड़ी बात तो यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर देश की जनता के पास कोई आर्थिक सुरक्षा और बचत नहीं है, उन की कमाई बमुश्किल इतनी है कि रोज़ कमाते हैं और खाते हैं. और जिन के पास चंद दिनों की तालाबंदी सहन करने की ताकत नहीं है, बुढ़ापा और बीमारी तो उन को भी आती होगी, तब क्या होता होगा इनका, यह सोच कर भी डर लगता है." इस में कोई दो राय नहीं हैं कि करोना के बाद की दुनिया, करोना से पहले की दुनिया से काफी अलग होगी, बल्कि अलग हो गयी है. समाज बदला है एवं और भी बदलेगा तो ज़रूर. बदलाव कि दिशा न तो पूर्वनिर्धारित या निश्चित है और न ही यह पूरी तरह से हमारी इच्छा से तय हो सकती.  पर हम इस की दिशा को प्रभावित करने की कोशिश तो ज़रूर कर सकते हैं.  और अगर अब भी प्रभावित नहीं कर सकेंगे तो समाज को कब प्रभावित कर सकेंगे? आपदा काल में पहले के ढांचे टूट जाते ह...

रेलगाड़ी से मजदूरों का कटना सरकारी नीतियों की विफलता

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   रेलगाड़ी से मजदूरों का कटना सरकारी नीतियों की विफलता (कोरोना में तो पता नहीं नंबर आएगा या नहीं लेकिन 50 दिन में हर रोज हो रही है हमारी मौत? ) जिन्होंने रेल गाड़ी के ऊपर सवार होना चाहिए था जब वह रेल गाड़ी के नीचे आ जाते हैं तब सिर्फ उन विचारों की ही नहीं हमारी मौत होती है ।तब भी होती है जब हम इस हादसे को महज एक दुर्घटना मान लेते हैं जैसे सड़क पर किसी कार और ट्रक का भीड़ जाना (काश यह मजदूर ट्रेन के सामने खड़े होकर बैठ कर मरे होते जैसे चीन के तियानामैन स्क्वायर के सामने वह साधारण व्यक्ति टैंक से भिड गया था कम से कम शहीद तो कहलाते) जब हम बताने लगते हैं कि भला रेल की पटरी भी कोई सोने की जगह है तब हम हत्या में शरीक होते हैं ।हमारी मौत होती है जब हम गणमान्य लोगों को संवेदना संदेश पढ़कर संतोष कर लेते हैं सोचिए और कर भी क्या सकते थे? बोल सकते थे अपनी मन की बात की मजदूर ही तो थे मर गए तो क्या हुआ इतने मरते हैं किस किस का ध्यान रखें? यह सच मान सकते थे कि यह मौत उनकी नीतियों का नतीजा है हमारी मौत होती है ।जब हम सरकार की जांच के परिणाम का इंतजार करते हैं किसकी जांच होगी क्या ...

भारतीय शिक्षा प्रणाली का गिरता स्तर

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जनसंख्या अध्ययन के अनुसार भारत में 15 से 24 आयु वर्ग में लगभग 63% कर्मचारियों की संख्या है। इतना कार्यबल, यदि काम करने के लिए तैनात किया जाता है, तो देश का चेहरा बदल सकता है, लेकिन वर्तमान प्रणाली केवल बड़े पैमाने पर छात्रों को मार रही  है।  रोजगार निर्माण की भ्रामक खबरों के अलावा सरकार के पास देने के लिए कुछ नहीं है।  24 वर्षीय प्रबंधन छात्र अर्जुन भारद्वाज ने मुंबई में 19 वीं मंजिल के होटल के कमरे से कूदकर आत्महत्या कर ली।  रिपोर्टों से पता चलता है कि वह परीक्षा में असफलता के बारे में उदास था और बार-बार सोशल मीडिया पर अपना जीवन समाप्त करने की बात करता था। भारद्वाज की कहानी ने सुर्खियां बटोरीं - सबसे अधिक संभावना है कि उन्होंने पांच सितारा होटल में खुद को मार डाला और फेसबुक पर आत्महत्या के तरीकों पर चर्चा की - लेकिन यह कोई अपवाद नहीं है: हर घंटे, एक छात्र भारत में आत्महत्या करता है।  2007 के बाद से छात्र आत्महत्याओं में 52% की वृद्धि हुई है ।छात्रों के बीच आत्महत्या की घटना बढ़ती कार्य क्षमता के अनुसार नौकरियों का निर्माण करने में भारतीय राज्य की नाका...
मेरे जिंदा साथियों           यह लोक डाउन है इमरजेंसी नहीं है। हम अपने जरूरी काम के लिए घरों से बाहर निकल सकते हैं और आज के समय में सबसे इंपोर्टेंट काम भूखे प्रवासी मजदूरों, उनके बच्चों को राशन दिलवाने के लिए मैदान में आने का काम है। लॉक डाउन में भूखे मरते मजदूरों के जीने के अधिकार का दम घोंटा जा रहा है।     यह लड़ाई सोशल मीडिया से नहीं जीती जा सकती बल्कि मैदान में आने से जीती जाएगी।               केंद्र व राज्य सरकार निकम्मी साबित हो रही है अनाज व जरूरी चीजों को देने के नाम पर छेछर कर रही है। मजदूरों का  एक-एक दिन भारी तकलीफों से गुजर रहा है। ◼️मज़दूरों पर 2-2 महीने का किराया बकाया हो गया है। ◼️किरयाना दुकानदार ने उधार देने बंद कर दिया है। ◼️ पैसों की कमी में महिलाये पैड भी नहीं खरीद सकती।       गृह मंत्रालय सचिव के अनुसार बसों द्वारा घर छोड़ने के लिये मजदूरों का पंजीकरण जरूरी है । ◼️लेकिन अभी तक पंजीकरण कोई प्रक्रिया शुरू नही की गई।        इन हालातों में सरकार  की ...