मेरे जिंदा साथियों
यह लोक डाउन है इमरजेंसी नहीं है। हम अपने जरूरी काम के लिए घरों से बाहर निकल सकते हैं और आज के समय में सबसे इंपोर्टेंट काम भूखे प्रवासी मजदूरों, उनके बच्चों को राशन दिलवाने के लिए मैदान में आने का काम है। लॉक डाउन में भूखे मरते मजदूरों के जीने के अधिकार का दम घोंटा जा रहा है। यह लड़ाई सोशल मीडिया से नहीं जीती जा सकती बल्कि मैदान में आने से जीती जाएगी।
केंद्र व राज्य सरकार निकम्मी साबित हो रही है अनाज व जरूरी चीजों को देने के नाम पर छेछर कर रही है। मजदूरों का एक-एक दिन भारी तकलीफों से गुजर रहा है।
◼️मज़दूरों पर 2-2 महीने का किराया बकाया हो गया है।
◼️किरयाना दुकानदार ने उधार देने बंद कर दिया है।
◼️ पैसों की कमी में महिलाये पैड भी नहीं खरीद सकती।
गृह मंत्रालय सचिव के अनुसार बसों द्वारा घर छोड़ने के लिये मजदूरों का पंजीकरण जरूरी है ।
◼️लेकिन अभी तक पंजीकरण कोई प्रक्रिया शुरू नही की गई।
इन हालातों में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गरीबों को नज़रअंदाज़ न करे । जरूरतमंदों को उनकी आजीविका के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाएं भोजन की उपलब्धता सबसे जरूरी है लेकिन आर्थिक गतिविधियां ठप पडी हैं इसलिए नगदी का वितरण भी उतना ही जरूरी हो गया है राशन का वितरण कम से कम 6 महीने और नगदी का वितरण तीन महीने तक होना चाहिए । संकट की गंभीरता और भूख व गरीबी के फैलने की गंभीर आशंका को देखते हुए सरकार को यह वितरण हर उस व्यक्ति तक करना चाहिए जिसको इसकी जरूरत है।
पूर्व आईएएस व मानव अधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर के अनुसार सरकार के पास अभी 2.4 करोड़ टन अनाज का बफर स्टॉक की तुलना में 7. 7 करोड़ टन अनाज का भंडार है। औऱ सरकार अभी रबी के 4 करोड़ टन खाद्यान की भी खरीद करने जा रही है ऐसे में अगर 130 करोड़ की जनसंख्या में से 80 प्रतिशत को 6 माह तक 10 किलो अनाज प्रतिमाह मुफ्त देना पड़े तो भी 6.24 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी । यही नहीं इस 6.24 करोड़ खाद्यान को बांटने में Fci को भण्डारण पर होने वाले 17472 करोड़ रुपये खर्च की भी बचत होगी। अनाज के साथ कुछ दाल तेल व नमक भी उपलब्ध करना चाहिए। किन्तु दाल का खर्च पहले ही वित्त मंत्री अपने पैकेज में शामिल कर चुकी है। इसके अलावा सरकार कुल जनसंख्या के 80 प्रतिशत लोगों के हर परिवार को 7000 रुपये के हिसाब से 3 महीनों तक नगदी देती है तो प्रति परिवार 5 लोगों के हिसाब से इसका खर्च 4 लाख 36 हजार 800 करोड़ रुपया होगा। इस तरह खाद्यान्न व नगदी पर कुल 5 लाख 53 हजार 800 करोड़ रुपए जो कि जीडीपी का सिर्फ 2.9 प्रतिशत ही खर्च होगा। यह कहने की जरूरत नही है कि इस जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा केंद्र के पास उप्लब्ध संसाधनो से आएगा। सप्लीमेंटरी बजट में जिन करो को प्रस्तावित किया गया था वे अपरिहार्य हो गए हैं। इसलिए अतिरिक्तखर्च या तो बजट घाटे से पूरा करे या फिर रिजर्व बैंक से उधार ले । यह न केवल महामारी से निपटने के लिए जरूरी है बल्कि लॉक डाउन के प्रभाव को कम करने के लिए भी आवश्यक है । कम से कम इस महामारी के जारी रहने तक सभी निजी अस्पतालों के राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए ताकि कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों का इलाज किया जा सके ।
शिशुओं के नियमित टीकाकरण को नजरअंदाज नही करना चाहिये।
साथियों , हमें इस प्रतिकूल समय में साहस और जज्बे के जीने के अधिकार की लड़ाई को तेज करना चाहिये।
इंकलाब जिंदाबाद
- सुमित सोनीपत
यह लोक डाउन है इमरजेंसी नहीं है। हम अपने जरूरी काम के लिए घरों से बाहर निकल सकते हैं और आज के समय में सबसे इंपोर्टेंट काम भूखे प्रवासी मजदूरों, उनके बच्चों को राशन दिलवाने के लिए मैदान में आने का काम है। लॉक डाउन में भूखे मरते मजदूरों के जीने के अधिकार का दम घोंटा जा रहा है। यह लड़ाई सोशल मीडिया से नहीं जीती जा सकती बल्कि मैदान में आने से जीती जाएगी।
केंद्र व राज्य सरकार निकम्मी साबित हो रही है अनाज व जरूरी चीजों को देने के नाम पर छेछर कर रही है। मजदूरों का एक-एक दिन भारी तकलीफों से गुजर रहा है।
◼️मज़दूरों पर 2-2 महीने का किराया बकाया हो गया है।
◼️किरयाना दुकानदार ने उधार देने बंद कर दिया है।
◼️ पैसों की कमी में महिलाये पैड भी नहीं खरीद सकती।
गृह मंत्रालय सचिव के अनुसार बसों द्वारा घर छोड़ने के लिये मजदूरों का पंजीकरण जरूरी है ।
◼️लेकिन अभी तक पंजीकरण कोई प्रक्रिया शुरू नही की गई।
इन हालातों में सरकार की जिम्मेदारी है कि वह गरीबों को नज़रअंदाज़ न करे । जरूरतमंदों को उनकी आजीविका के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करवाएं भोजन की उपलब्धता सबसे जरूरी है लेकिन आर्थिक गतिविधियां ठप पडी हैं इसलिए नगदी का वितरण भी उतना ही जरूरी हो गया है राशन का वितरण कम से कम 6 महीने और नगदी का वितरण तीन महीने तक होना चाहिए । संकट की गंभीरता और भूख व गरीबी के फैलने की गंभीर आशंका को देखते हुए सरकार को यह वितरण हर उस व्यक्ति तक करना चाहिए जिसको इसकी जरूरत है।
पूर्व आईएएस व मानव अधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर के अनुसार सरकार के पास अभी 2.4 करोड़ टन अनाज का बफर स्टॉक की तुलना में 7. 7 करोड़ टन अनाज का भंडार है। औऱ सरकार अभी रबी के 4 करोड़ टन खाद्यान की भी खरीद करने जा रही है ऐसे में अगर 130 करोड़ की जनसंख्या में से 80 प्रतिशत को 6 माह तक 10 किलो अनाज प्रतिमाह मुफ्त देना पड़े तो भी 6.24 करोड़ टन अनाज की जरूरत होगी । यही नहीं इस 6.24 करोड़ खाद्यान को बांटने में Fci को भण्डारण पर होने वाले 17472 करोड़ रुपये खर्च की भी बचत होगी। अनाज के साथ कुछ दाल तेल व नमक भी उपलब्ध करना चाहिए। किन्तु दाल का खर्च पहले ही वित्त मंत्री अपने पैकेज में शामिल कर चुकी है। इसके अलावा सरकार कुल जनसंख्या के 80 प्रतिशत लोगों के हर परिवार को 7000 रुपये के हिसाब से 3 महीनों तक नगदी देती है तो प्रति परिवार 5 लोगों के हिसाब से इसका खर्च 4 लाख 36 हजार 800 करोड़ रुपया होगा। इस तरह खाद्यान्न व नगदी पर कुल 5 लाख 53 हजार 800 करोड़ रुपए जो कि जीडीपी का सिर्फ 2.9 प्रतिशत ही खर्च होगा। यह कहने की जरूरत नही है कि इस जिम्मेदारी का बड़ा हिस्सा केंद्र के पास उप्लब्ध संसाधनो से आएगा। सप्लीमेंटरी बजट में जिन करो को प्रस्तावित किया गया था वे अपरिहार्य हो गए हैं। इसलिए अतिरिक्तखर्च या तो बजट घाटे से पूरा करे या फिर रिजर्व बैंक से उधार ले । यह न केवल महामारी से निपटने के लिए जरूरी है बल्कि लॉक डाउन के प्रभाव को कम करने के लिए भी आवश्यक है । कम से कम इस महामारी के जारी रहने तक सभी निजी अस्पतालों के राष्ट्रीयकरण किया जाना चाहिए ताकि कोरोना के अलावा अन्य बीमारियों का इलाज किया जा सके ।
शिशुओं के नियमित टीकाकरण को नजरअंदाज नही करना चाहिये।
साथियों , हमें इस प्रतिकूल समय में साहस और जज्बे के जीने के अधिकार की लड़ाई को तेज करना चाहिये।
इंकलाब जिंदाबाद
- सुमित सोनीपत
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