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Showing posts from 2020

दमनकारी कानूनों के खिलाफ उठ रही आवाज

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लंबे समय से छात्रों, नौजवानों, शिक्षकों, वकीलों आदि लोगों को, जो जनता के हकों की आवाज उठाते हैं, सरकार की गलत नीतियों की आलोचना करते हैं, यूएपीएUAPA व एनएसएNSAजैसी खतरनाक आतंकवादी धाराएं लगाकर जेलों में डाला जा रहा है। जनता की आवाज उठाने वाले लोगों के भाषणों को गलत तरीके से तोड़ मरोड़ कर, उसी के खिलाफ सबूत के तौर पर प्रयोग किया जा रहा है। क्या देश की जनता की आवाज उठाने वाले लोगों से देश को खतरा हो सकता है? क्या यह जानते हुए भी की, एक आलोचना करने पर ही आपको जेल में डाला जा सकता है, अपनी जान की परवाह न करते हुए, जनता की दुख तकलीफो के सामने, अपने दुखों को भूल कर उनके लिए, उनके अधिकारों के लिए लड़ते हैं, क्या उनसे हमारे देश को खतरा है? सरकार तानाशाही रवैया अपनाते हुए अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को दबा देना चाहती है व कुछ चंद लोगों के फायदे के लिए सभी संसाधनों को बेचने पर अमादा है। सरकारी सेक्टर को लगातार प्राइवेट हाथों में सौंपा जा रहा है। रेलवे, रोडवेज, बिजली विभाग आदि को लगभग बेच दिया गया है। जो लोग सरकार की इन विनाशकारी नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, उन्हें देश की सुरक्षा के लिए खत...

भारत में हिन्दू धर्म 'अफीम' नहीं बल्कि 'जहर' है: पेरियार

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  पेरियार: हमारे आधुनिक चार्वाक संयोग से 'पेरियार इ वी रामासामी' के जन्म दिन [17 सितम्बर] के दिन ही 'पितृपक्ष' का आख़िरी दिन भी है. पितृपक्ष के अनुष्ठान पर तीखा हमला करते हुए पेरियार ने कहा था कि जब दुनिया दूसरे ग्रहों पर अपने सन्देशे भेज रही है तो हम ब्राह्मणों के जरिये अपने पुरखों को चावल-दाल पंहुचा रहे है. यह कौन सी बुद्धिमानी है. भौतिकवादी चार्वाक ने भी इस पर तीखा हमला करते हुए अपने समय में कहा था- 'यदि मुंडेर पर खाना रख देने से वो आसमान में पुरखो के पास चला जाता है तो छत पर बैठे अपने बाप को खाना देने ऊपर छत पर क्यों जाते हो. यही नीचे रख दो, तुम्हारे बाप के पेट में पहुच जायेगा.' आधुनिक समय में पेरियार और डा. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म के ठीक कोर पर हमला बोला. जहां अम्बेडकर ने मुख्यतः वैचारिक जमीन से हमला बोला वहीं पेरियार ने मुख्यतः आंदोलनात्मक जमीन से हमला बोला. लेकिन दोनों का उद्देश्य एक ही था. हिन्दू कहे जाने वाले समाज का पूर्ण जनवादीकरण. हिन्दू धर्म का जिस तरह का सामाजिक ढांचा था [और है], उसमे 'सामाजिक अत्याचार' किसी भी तरह से 'राजनीतिक अत्याचार...

मंडल कमीशन की ऐसी कौन सी सिफारिश हैं जिनके बारे में शायद ही कहीं चर्चा होती है ?

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मंडल कमीशन की ऐसी कौन सी सिफारिश हैं जिनके बारे में शायद ही कहीं चर्चा होती है ? भारतीय राजनीति में बहुत झूठ बोले जाते हैं उसी तरह एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की जा चुकी हैं जबकि ऐसा है नहीं। मंडल आयोग ने जो सिफारिशें की थी उसमें से सिर्फ दो ही लागू की गई वह भी पूरी नहीं आधी अधूरी और जो आधी अधूरी भी लागू की गई वो भी बड़ी बेईमानी और चालाकी से। पहली सिफारिश 1993 में सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण वाली लागू की गई जो आज तक अच्छे से लागू नहीं हुई है।उसके बाद 2007 में शिक्षण संस्थानों में दाखिले की सिफारिश लागू की गई। इसके अलावा भी कई सिफारिशें मंडल आयोग ने की थी जिनमें से एक ऐसी भी है जिस पर शायद ही कहीं चर्चा होती हो! मंडल आयोग की रिपोर्ट के पहले भाग में 13वां अध्याय आयोग द्वारा की गई सिफारिशों का है। जिसमें कुल 40 सिफारिशें हैं। सिफारिश नंबर 32 से 36 तक ढांचागत बदलाव को लेकर की गई सिफारिश हैं। जिनको सरकार के साथ-साथ वंचित तबके के बुद्धिजीवियों ने भी शायद भुला ही दिया है । इन सिफारिशों के बारे में खुद आयोग का मानना था कि जब तक यह सिफारिश लागू नहीं होंगी ...

सिर्फ 9 ओबीसी प्रोफेसर हैं 50 केंद्रीय विश्वविद्यालय में

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 सिर्फ 9 ओबीसी प्रोफेसर हैं 50 केंद्रीय विश्वविद्यालय में देश में सबसे सर्वोच्च संविधान है , जिसमें देश के प्रत्येक नागरिक को एक समान अवसर प्राप्त कराने का दावा किया गया है। इसी दावे को पूरा करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई ताकि सामाजिक और राजनीतिक रुप से पिछड़े वर्ग के लोगों को समान रूप से आगे बढ़ने का मौका मिले। हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और ही आंकड़े पेश कर रहे हैं। 24 अगस्त को द प्रिंट पर कृतिका शर्मा और सानिया धींगडा की एक रिपोर्ट लगी है । जिसमें दिया गया है कि भारत के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालय में सिर्फ 9 प्रोफेसर ही ओबीसी(obc) के हैं । जबकि होने चाहिए 313.  1993 में ओबीसी को आरक्षण दिया गया, 27 साल के लंबे काल के बाद आखिर क्यों ओबीसी को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया? एसोसिएट प्रोफेसर होने चाहिए थे 735 लेकिन हैं सिर्फ 38. असिस्टेंट प्रोफेसर के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन पूरा प्रतिनिधित्व यहां भी नहीं है। ओबीसी की 2232 में से 1327 पोस्ट ही भरी गई हैं। 905 ओबीसी की पोस्ट यहां भी खाली हैं यह आंकड़े 1 जनवरी 2020 तक के हैं।  द प्रिंट की 5 अगस्त 2020 की मौ...

अब आप ही तय कीजिये की हमारा शिक्षक कौन है?

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 शिक्षक दिवस पर   --                          हमारा शिक्षक कौन? 'शिक्षक दिवस'  [5 सितम्बर ] को डाॅ राधाकृष्णन से जोड़ने का क्या औचित्य है? आखिर शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान क्या है? या इससे भी बढ़कर समाज के लिए ही उनका क्या योगदान है? आखिर राधाकृष्णन का दर्शन क्या है?                                                                                   बहुत से दलित व प्रगतिशील संगठन सावित्री बाई फुले के जन्म दिन (4 जनवरी) को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाते है। राधाकृष्णन का जन्म 5 सितम्बर 1888 को आन्ध्र प्रदेश के एक गांव में एक ब्राहमण परिवार में हुआ था। दर्शन में उच्च शिक्षा लेने के बाद उन्होने आन्ध्र, मैसूर और कोलकाता में दर्शन के प्रोफेसर के रुप में दर्शन पढ़ाया। कुछ समय उन्होंने आक्सफोर्ड में ...

क्या ये जिंदगी महत्त्व नहीं रखती???

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 जिस सीवर का ढक्कन खुलने के बाद लोग उसके पास नहीं खडे हो पाते उसमें अन्दर उतरते यें मजदूर भी इन्सान हैं? यह फोटो तिलक नगर/मॉडल टाउन रोहतक की है। सीवर में इस तरीके से उतर कर सफाई करने पर 2013 में संसद में कानून बनाकर प्रतिबंध लगाया जा चुका है।   लेकिन यह अमानवीय परिस्थिति में काम आज भी जारी है। इन्ही परिस्थितियों में 2019 में रोहतक में 5 सीवर कर्मचारियों की मौत भी हो चुकी है। लेकिन शासन और प्रशासन ने कोई सबक नहीं लिया और न ही कोई पुख्ता इंतजाम किये। इनको ऐसे ही बिना सुरक्षा इंतजाम और बिना उपयुक्त उपकरणों के काम करना होता है। *इतनी मेहनत के बावजूद इनको सिर्फ 9100 रुपए ही हर महीने मिल पाते हैं।* जबकि कागजों में  तो 15100 का दावा किया जा रहा है। क्या 15100 सो रुपए भी पर्याप्त हैं? लेकिन ये कर्मचारी चाहते हैं कि हमें 15100  से भी मिल जाएं तो भी हम खुश हैं।  इतनी मेहनत करने के बावजूद इतनी कम पगार पाने के बावजूद नीची जाति का ताना अलग रह जाता है। क्या सारे समाज की गंदगी को साफ करने वाले नीचे हो गये? और गन्दगी करने वाले ऊंचे? क्यों हम इस बारे में चर्चा कम ही करते हैं? क्...

श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ मेहनतकश जनता का संयुक्त अभियान

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श्रम कानूनों में बदलाव के खिलाफ मेहनतकश जनता का संयुक्त अभियान 9 अगस्त 2020,को अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन में शामिल हों श्रम कानूनों में बदलाव के साथ ही सभी न्यायपसंद लोगों द्वारा मिलकर सरकार की तानाशाही का जवाब देने के लिए गांव-गांव, बस्तियों, शहरों में जनसभाओं का आयोजन किया जा रहा है। जिसमें देश के तमाम हिस्सों में काम करने वाले मजदूर संगठन, ट्रेड यूनियन, छात्र संगठन शामिल हैं। हरियाणा में मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान मासा के तहत बहुत सारे संगठन जमीनी स्तर पर लगातार मजदूरों छोटे किसानों दुकानदारों दिहाड़ी मजदूरी करने वालों के बीच गांव अभियान के तहत जा रहे हैं। जहां सरकार की जन विरोधी नीतियों का असर साफ तौर पर देखा जा सकता है। गांव में बहुत बड़ी तादाद में लोक डाउन में हुई छंटनी के दौरान घर वापस आए मजदूर मिलते हैं। ज्यादातर आबादी बेरोजगारी के साथ गरीबी और महंगाई के दौर में तंग हाल जिंदगी जीने को मजबूर हैं। गांव अभियान के दौरान यह बात सामने आई कि मनरेगा स्कीम के तहत कुछ गांव में काम चल रहा है लेकिन इस स्कीम के तहत लगभग हर गांव में बड़े-बड़े घोटालों को अंजाम दिया जा रहा है मजदूरों को काम क...

मनरेगा मजदूरों का संघर्ष और उनकी मांगे

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मनरेगा मजदूरों का संघर्ष और उनकी मांगे कोरोना की वजह से हुई तालाबंदी के कारण बहुत सारे महिला और पुरुष मजदूर गांव में मनरेगा स्कीम के तहत जुड़े हुए हैं जहां सैकड़ों समस्याओं ने उनकी जिंदगी को और दयनीय बना दिया है आज मनरेगा मजदूरों ने मनरेगा मजदूर यूनियन के नेतृत्व में SDM गोहाना आशीष कुमार जी से मिले और उनके माध्यम से प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नाम ज्ञापन सौंपा। यूनियन की तरफ से रेखा रानी ने कहा कि कोरोना की वजह से हुई तालाबंदी के दौरान फैक्ट्रीयों में छंटनी शुरु हो चुकी है जिसकी वजह से मजदूर परिवारों में बेरोजगारी बढ़ी है जिसको ध्यान में रखते हुए काम के दिन 100 से बढ़ाकर 200 किये जायें। संतोष ने कहा कि अब मनरेगा के तहत अर्द्धकुशल के साथ साथ कुशल काम भी करवाया जाने लगा है और मनरेगा को भी मिनिमम वेज से जोड़ा जाये और दिहाड़ी 309 रू से बढ़ाकर 800 रू किये जाये। मन्दीप ने मांग की कि हमें गांव के अन्दर ही काम दिया जाए और मजदूरों का बीमा किया जाये। यूनियन के प्रदेश कमेटी सदस्य सुमित ने मांग की कि मुआवजा 25000 रू से बढ़ाकर 10 लाख रुपए किया जाये और तमाम जरूरी सामान भी कार्यस्थल...

भारत-नेपाल विवाद और कालापानी का सच

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भारत-नेपाल विवाद और कालापानी का सच आनंद स्वरूप वर्मा नवम्बर 1814 से मार्च 1816 तक नेपाल (जिसे उस समय गोरखा अधिराज्य कहा जाता था) और भारत पर शासन कर रही ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच युद्ध चला जिसमें नेपाल को पराजय का सामना करना पड़ा। 4 मार्च 1816 को सम्पन्न सुगौली संधि के साथ इस युद्ध का समापन हुआ और संधि के फलस्वरूप नेपाल को अपने एक तिहाई हिस्से से हाथ धोना पड़ा। संधि से पहले तक जो नेपाल का भू-भाग था वह ब्रिटिश भारत में शामिल कर लिया गया। नेपाल, जो कभी किसी का उपनिवेश नहीं रहा, अब भी एक स्वतंत्र राष्ट्र तो था लेकिन संधि के अनुसार काठमांडो में स्थायी तौर पर एक ब्रिटिश रेजिडेंट की नियुक्ति हुई और ब्रिटिश सेना के लिए गोरखा सैनिकों की भर्ती की प्रथा शुरू हुई। वैसे भी ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का मकसद तिब्बत तक व्यापार के लिए रास्ता तैयार करना था। सुगौली संधि की धारा 5 के अनुसार महाकाली नदी के पूर्व का क्षेत्र नेपाल के हिस्से में आया और इसके पश्चिम का सारा क्षेत्र ब्रिटिश भारत में मिल गया। इस संधि में लिंपियाधारा को महाकाली नदी का स्रोत बताया गया है। कालापानी और लीपुलेख महाकाली नदी के पू...

गांव कोहला के सरपंच द्वारा किया गया फर्जीवाड़ा

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गांव कोहला(सोनीपत) के सरपंच द्वारा किया गया फर्जीवाड़ा 13 लाख 72 हजार ₹572 की मजदूरी का कोई अता पता नहीं(Rs.13,72,542) पूरा मामला यह है कि गांव के सरपंच जगदीप बांगड़ ने सितंबर ,अक्टूबर 2017 में गांव के मजदूरों से मनरेगा का नाम लेकर 142 मजदूरों से 40 से 50 दिन तक लगातार काम करवाया और बाद में दिहाड़ी दिलवाने से मुकर गया ।सरपंच ने यह काम बिना डिमांड फार्म लिए और बिना मस्टर रोल निकलवाए करवाया । इस फर्जीवाड़े में गांव के ही 2 पंच अजीत %रामकुवांर ,सुनील % रामचंद्र भी शामिल है ।दोनों पंचों ने मजदूरों की दिहाड़ी रजिस्टर में चढ़ाई थी। अपने चहेतों के खाते में डलवाए मजदूरों के पैसे:- मनरेगा मजदूर यूनियन का आरोप है कि सरपंच और पंचों ने अपने चहेतों के जॉब कार्ड बनवा कर उनके खाते में पैसे डलवाये हैं । जिनके खाते में पैसे आए हैं उन्होंने हकीकत में कोई काम नहीं किया है और वें अधिकतर खुद को गांव का रसूखदार आदमी मानते हैं. अगर सरपंच मजदूरों की दिहाड़ी नहीं देता है तो मनरेगा मजदूर यूनियन कोर्ट तक जाएगी। मनरेगा मजदूर यूनियन पिछले 8 साल से प्रदेश के 6  जिलों में मजदूरों के अधिकारों के लिए...

ऑनलाइन शिक्षा माध्यम की जमीनी हकीकत

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"वर्तमान समय में छात्र-छात्राओं , बुद्धिजीवियों में आनलाईन शिक्षा , आनलाईन परिक्षा के संबंध मे एक बहस छिडी हुई है।मध्यम वर्गीय छात्र-छात्राओं का एक छोटा तबका जो आर्थिक तौर पर मजबूत और तकनीकी कौशल का ज्ञान रखता है सिर्फ वही आनलाईन परिक्षा के लिए सहमत है । लेकिन छात्र-छात्राओं का बहुत बड़ा तबका जो सामान्य मजदूर -किसान परिवारों से आता है और सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी   रूप से पिछड़ेपन को झेल रहा है ,आनॅलाइन परिक्षा माध्यम के पक्ष में नहीं हैl शिक्षा ,शिक्षण पद्धति का सवाल समाज के बौद्धिक  विकास के साथ सीधे रूप से जुड़ा हुआ है ।ज्ञान का आधार उत्पादन व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है। ऐतिहासिक रूप से हर व्यवस्था में ऐसा विशेष वर्ग रहा है जिसका संसाधनों पर कब्जा रहा है। राज्य तंत्र के विकास का अर्थ उस विशेषाअधिकारी  वर्ग का ही विकास है जिसमें व्यापक जनता से किसी तरह का सरोकार नहीं रखा जाता। तमाम तरह के नियम, कानून ,सुविधाएं विशेष वर्ग को केंद्र में रखकर बनाई जाती हैं ताकि तथाकथित 'चौतरफा विकास' की अवधारणा स्थापित की जा सके। आधुनिकता के नाम पर ...

बेहतर समाज: अब नहीं तो कब?

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    बेहतर समाज: अब नहीं तो कब?             "इस अवसर पर परिवर्तन के प्रति आशावान होने के कुछ विशेष कारण भी हैं. वर्तमान व्यवस्था कि कई कमज़ोरियाँ जो दबी ढकी थी, वो उघड कर सामने आ गई हैं, सब से बड़ी बात तो यह है कि बहुत बड़े पैमाने पर देश की जनता के पास कोई आर्थिक सुरक्षा और बचत नहीं है, उन की कमाई बमुश्किल इतनी है कि रोज़ कमाते हैं और खाते हैं. और जिन के पास चंद दिनों की तालाबंदी सहन करने की ताकत नहीं है, बुढ़ापा और बीमारी तो उन को भी आती होगी, तब क्या होता होगा इनका, यह सोच कर भी डर लगता है." इस में कोई दो राय नहीं हैं कि करोना के बाद की दुनिया, करोना से पहले की दुनिया से काफी अलग होगी, बल्कि अलग हो गयी है. समाज बदला है एवं और भी बदलेगा तो ज़रूर. बदलाव कि दिशा न तो पूर्वनिर्धारित या निश्चित है और न ही यह पूरी तरह से हमारी इच्छा से तय हो सकती.  पर हम इस की दिशा को प्रभावित करने की कोशिश तो ज़रूर कर सकते हैं.  और अगर अब भी प्रभावित नहीं कर सकेंगे तो समाज को कब प्रभावित कर सकेंगे? आपदा काल में पहले के ढांचे टूट जाते ह...

रेलगाड़ी से मजदूरों का कटना सरकारी नीतियों की विफलता

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   रेलगाड़ी से मजदूरों का कटना सरकारी नीतियों की विफलता (कोरोना में तो पता नहीं नंबर आएगा या नहीं लेकिन 50 दिन में हर रोज हो रही है हमारी मौत? ) जिन्होंने रेल गाड़ी के ऊपर सवार होना चाहिए था जब वह रेल गाड़ी के नीचे आ जाते हैं तब सिर्फ उन विचारों की ही नहीं हमारी मौत होती है ।तब भी होती है जब हम इस हादसे को महज एक दुर्घटना मान लेते हैं जैसे सड़क पर किसी कार और ट्रक का भीड़ जाना (काश यह मजदूर ट्रेन के सामने खड़े होकर बैठ कर मरे होते जैसे चीन के तियानामैन स्क्वायर के सामने वह साधारण व्यक्ति टैंक से भिड गया था कम से कम शहीद तो कहलाते) जब हम बताने लगते हैं कि भला रेल की पटरी भी कोई सोने की जगह है तब हम हत्या में शरीक होते हैं ।हमारी मौत होती है जब हम गणमान्य लोगों को संवेदना संदेश पढ़कर संतोष कर लेते हैं सोचिए और कर भी क्या सकते थे? बोल सकते थे अपनी मन की बात की मजदूर ही तो थे मर गए तो क्या हुआ इतने मरते हैं किस किस का ध्यान रखें? यह सच मान सकते थे कि यह मौत उनकी नीतियों का नतीजा है हमारी मौत होती है ।जब हम सरकार की जांच के परिणाम का इंतजार करते हैं किसकी जांच होगी क्या ...