मंडल कमीशन की ऐसी कौन सी सिफारिश हैं जिनके बारे में शायद ही कहीं चर्चा होती है ?

मंडल कमीशन की ऐसी कौन सी सिफारिश हैं जिनके बारे में शायद ही कहीं चर्चा होती है ?

भारतीय राजनीति में बहुत झूठ बोले जाते हैं उसी तरह एक बहुत बड़ा झूठ यह है कि 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू की जा चुकी हैं जबकि ऐसा है नहीं। मंडल आयोग ने जो सिफारिशें की थी उसमें से सिर्फ दो ही लागू की गई वह भी पूरी नहीं आधी अधूरी और जो आधी अधूरी भी लागू की गई वो भी बड़ी बेईमानी और चालाकी से। पहली सिफारिश 1993 में सरकारी नौकरियों में 27% आरक्षण वाली लागू की गई जो आज तक अच्छे से लागू नहीं हुई है।उसके बाद 2007 में शिक्षण संस्थानों में दाखिले की सिफारिश लागू की गई। इसके अलावा भी कई सिफारिशें मंडल आयोग ने की थी जिनमें से एक ऐसी भी है जिस पर शायद ही कहीं चर्चा होती हो! मंडल आयोग की रिपोर्ट के पहले भाग में 13वां अध्याय आयोग द्वारा की गई सिफारिशों का है। जिसमें कुल 40 सिफारिशें हैं। सिफारिश नंबर 32 से 36 तक ढांचागत बदलाव को लेकर की गई सिफारिश हैं। जिनको सरकार के साथ-साथ वंचित तबके के बुद्धिजीवियों ने भी शायद भुला ही दिया है । इन सिफारिशों के बारे में खुद आयोग का मानना था कि जब तक यह सिफारिश लागू नहीं होंगी तब तक बाकी सिफारिशें सिर्फ दर्द घटाने वाली औषधि साबित होंगी अगर दर्द को जड़ से मिटाना है(जातिय शोषण का जड़ से खात्मा) तो इन सिफारिशों को लागू करना जरूरी है । अगर यह सिफारिश लागू होती हैं तो जाति के ताबूत में आखिरी कील साबित होंगी । यह क्रांतिकारी और प्रगतिशील सिफारिश निम्न हैं:-



यह सिफारिशें लागू करना शायद इस व्यवस्था के काबू से बाहर की बात है। इसलिए इन सिफारिशों को लागू करने के लिए वंचित तबके को खुद को नए सिरे से एकजुट करना होगा। पूना पैक्ट के दायरे से बाहर निकल कर उसे नामंजूर करना होगा और संघर्ष को नयी धार देनी होगी।

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