सिर्फ 9 ओबीसी प्रोफेसर हैं 50 केंद्रीय विश्वविद्यालय में
सिर्फ 9 ओबीसी प्रोफेसर हैं 50 केंद्रीय विश्वविद्यालय में
देश में सबसे सर्वोच्च संविधान है , जिसमें देश के प्रत्येक नागरिक को एक समान अवसर प्राप्त कराने का दावा किया गया है। इसी दावे को पूरा करने के लिए आरक्षण की व्यवस्था की गई ताकि सामाजिक और राजनीतिक रुप से पिछड़े वर्ग के लोगों को समान रूप से आगे बढ़ने का मौका मिले। हालांकि जमीनी हकीकत कुछ और ही आंकड़े पेश कर रहे हैं।
24 अगस्त को द प्रिंट पर कृतिका शर्मा और सानिया धींगडा की एक रिपोर्ट लगी है । जिसमें दिया गया है कि भारत के तमाम केंद्रीय विश्वविद्यालय में सिर्फ 9 प्रोफेसर ही ओबीसी(obc) के हैं । जबकि होने चाहिए 313. 1993 में ओबीसी को आरक्षण दिया गया, 27 साल के लंबे काल के बाद आखिर क्यों ओबीसी को पूरा प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया? एसोसिएट प्रोफेसर होने चाहिए थे 735 लेकिन हैं सिर्फ 38. असिस्टेंट प्रोफेसर के मामले में स्थिति थोड़ी बेहतर है लेकिन पूरा प्रतिनिधित्व यहां भी नहीं है। ओबीसी की 2232 में से 1327 पोस्ट ही भरी गई हैं। 905 ओबीसी की पोस्ट यहां भी खाली हैं यह आंकड़े 1 जनवरी 2020 तक के हैं। द प्रिंट की 5 अगस्त 2020 की मौशमी दास गुप्त की रिपोर्ट के हिसाब से मंत्रालयों के 89 सचिवों में एक भी ओबीसी नहीं है। क्या यह भारतीय व्यवस्था के ब्राह्मणवादी चरित्र के कारण ऐसा है? या कुछ और कारण है?
https://theprint.in/india/education/only-9-obc-professors-teaching-in-central-universities-across-india-against-313-quota-posts/486458/

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