रेलगाड़ी से मजदूरों का कटना सरकारी नीतियों की विफलता

   रेलगाड़ी से मजदूरों का कटना सरकारी नीतियों की विफलता




(कोरोना में तो पता नहीं नंबर आएगा या नहीं लेकिन 50 दिन में हर रोज हो रही है हमारी मौत? )


जिन्होंने रेल गाड़ी के ऊपर सवार होना चाहिए था जब वह रेल गाड़ी के नीचे आ जाते हैं तब सिर्फ उन विचारों की ही नहीं हमारी मौत होती है ।तब भी होती है जब हम इस हादसे को महज एक दुर्घटना मान लेते हैं जैसे सड़क पर किसी कार और ट्रक का भीड़ जाना (काश यह मजदूर ट्रेन के सामने खड़े होकर बैठ कर मरे होते जैसे चीन के तियानामैन स्क्वायर के सामने वह साधारण व्यक्ति टैंक से भिड गया था कम से कम शहीद तो कहलाते) जब हम बताने लगते हैं कि भला रेल की पटरी भी कोई सोने की जगह है तब हम हत्या में शरीक होते हैं ।हमारी मौत होती है जब हम गणमान्य लोगों को संवेदना संदेश पढ़कर संतोष कर लेते हैं सोचिए और कर भी क्या सकते थे? बोल सकते थे अपनी मन की बात की मजदूर ही तो थे मर गए तो क्या हुआ इतने मरते हैं किस किस का ध्यान रखें? यह सच मान सकते थे कि यह मौत उनकी नीतियों का नतीजा है हमारी मौत होती है ।जब हम सरकार की जांच के परिणाम का इंतजार करते हैं किसकी जांच होगी क्या ठीकरा उस बेचारे ट्रेन ड्राइवर के सिर पर फूट आएगा ?जिसे सुबह सुबह दिखाई नहीं दिया कि दूर पटरी पर कुछ लोग सोए पड़े हैं जिसने इतनी बड़ी ट्रेन को रोकने की भरसक कोशिश की कोशिश की मगर रोक नहीं पाया क्या उन अनुशासन हीन मजदूरों को दोषी पाया जाएगा ?जो थकान से चूर होकर कुछ देर के लिए पटरी पर सिर रख कर लेटे होंगे या जांच रोटियों की होगी जो घटना स्थल पर बिक्री पाई गई जिन के लालच में यह मजदूर शहर छोड़ कर वापस मध्यप्रदेश में अपने गांव तक चले जा रहे थे या जांच सौ के उस जुड़े मुड़े नोट की होगी जो पटरी पर मिला ?क्या कभी हिम्मत होगी उन बड़ी कुर्सियों की जांच करने कि जिन के आदेशों से यह मजदूर पैदल चलने को मजबूर हुए?





हमारी मौत तब भी होती है जब हम रोज लोगों के चलते होने वाले मौतों को खबरों से आंख मूंद लेते हैं। औरंगाबाद के हादसे पहले 356 मौत हो चुकी थी (इनका पूरा विवरण thejeshgn.com वेबसाइट पर उपलब्ध है) इनमें से सबसे  अधिक मौत उन  लोगों की हुई है जिन्होंने कोरोना पाॅजिटिव पाए जाने की आशंका  से आत्महत्या कर ली ,जो खाने और पैसे के अभाव में मर गए या जो सड़क दुर्घटना में मारे गए। कोरोना के  हर केस की गिनती रखने वाले मीडिया में शायद ही इस आंकड़े की कभी सुध ली ।इसमें वह मौतें शामिल नहीं है जो अस्पताल न पहुंच पाने से हुई या आजिविका खत्म होने के कारण पैदा हुई भुखमरी से हुई होंगी।
 हमारी मौत तब होती है, जब हम मौत का इंतजार करते हैं ।जब पूरे देश को लाॅकडाउन करते समय हम सोचते भी नहीं की देहाती मजदूर का क्या होगा ?जब वित्त मंत्री के राहत पैकेज के बाद हम पूछते भी नहीं कि जिस गरीब के पास राशन कार्ड नहीं है उसका क्या होगा ?जब हम यह मांग नहीं करते केंद्र देशभर में मिड डे मील की जगह भूखे लोगों के लिए लंगर शुरू कर दे ।ऊंची आवाज करके नहीं पूछते कि संकट के समय भी सरकार गेहूं चावल के दाम पर मोल भाव क्यों कर रही है ।जब देश की सर्वोच्च अदालत यह नहीं सोचती कि घर में परिवार की रोटी के अलावा भी पैसे की जरूरत हो सकती है ।







हमारी मौत तब होती है जब हम टीवी पर गठरी उठाए सड़क पर चलते मजदूरों की तस्वीर को देख लेते हैं। खबर टीवी से उतरी और हम मान लेते हैं कि समस्या सुलझ गई। हर रोज मजदूरों के सैकड़ों की यात्रा की खबर आती है और हम उसे रोमांचक कहानियों की तरह पढ़ते रहते हैं जब सैलानियों और तीर्थ यात्रियों को लग्जरी बस में लाया जाता है और गरीब मजदूर को सड़क पर छोड़ दिया जाता है और हम चुप रहते हैं। विदेश से भारत के नागरिकों को मुफ्त हवाई जहाज से लाया जाता है और बेंगलुरु से बिहार जाने वाले प्रवासी मजदूर से किराया मांगा जाता है ।जब सत्ताधीश यह झूठ बोल कर पिंड छुटा लेते हैं कि हम तो टिकट का 85% खर्च उठा रहे हैं और हम उनकी बात पर भरोसा कर लेते हैं ।

हमारी मौत तब होती है जब देशभर में मजदूरों के कानून रातोंरात बदल दिए जाते हैं और हम ध्यान भी नहीं देते। जब सरकारें देसी विदेशी कंपनी को खुला आमंत्रण देती है "आप निवेश करो लेबर की चिंता मत करो" और हम भी निवेश के आंकड़े गिनने में व्यस्त हो जाते हैं पिछले 50 दिन में 890 मौत हुई आशा करनी चाहिए कि अब और नहीं होगी। इन दिनों करोडों आजीविका भी छिनी है आशा करनी चाहिए कि इस असर को जल्दी ही हमने पलट सकेंगे। लेकिन हमारी सामाजिकता और संवेदना की जो मौत हुई है उसका क्या करेंगे?

योगेंद्र यादव
सेफोलाॅजिस्ट ,
अध्यक्ष स्वराज इंडिया

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